माइंडफुल पॉज़
आज मैं अपनी बात कहने के लिए अमेरिका के सुप्रसिद्ध लेखक और वक्ता श्रीमान डेल कार्नेगी जी का एक प्रसंग लेकर आई हूँ।उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है कि एक बार उनकी एक रेडियो वार्ता प्रसारित हुई जो अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रीय अब्राहम लिंकन के जीवन और कार्यकाल पर आधारित थी। इस वार्ता में उन्होंने लिंकन से सम्बंधित कुछ तथ्य भूलवश गलत बोल दिए।लिंकन की प्रशंसक एक महिला ने वह वार्ता सुनी और आगबबूला होकर वार्ताकार श्री कार्नेगी जी को तुरन्त एक पत्र लिखकर बेहद रोष व्यक्त किया।उस महिला ने लिखा कि जब तुम लिंकन के बारे में सही जानकारी नही रखते हो तो तुमने व्याख्यान देने की जुर्रत कैसे की, वह भी रेडियो पर।सारे मुल्क ने तुम्हारा त्रुटिपूर्ण व्याख्यान सुन।शीघ्र ही तुमअपनी भूल सुधारो और सार्वजनिक रूप से क्षमा माँगो।
ज्योंही पत्र डेल को मिला उन्होंने आव देखा न ताव और लगभग वैसा ही जहरीला जवाबी पत्र लिखा।लेकिन रात्रि अधिक हो गई थी तो उन्होंने सोचा अगली सुबह उक्त पत्र पोस्ट कर देंगे।पत्र को टेबिल पर रखकर वह सो गए।सुबह उठते ही उनकी नजर उस पत्र पर गई तो उन्होंने दोबारा वह पत्र पढा। और उन्हें लगा कि इतने क्रोध की भी कोई आवश्यकता नहीं थी।रात भर के फासले से क्रोध का ज्वार कम हो गया।तो उन्होंने सोचा इतनी कड़वाहट उचित नहीं है दूसरा पत्र लिखा जाए।उन्होंने दूसरा पत्र लिखा उसमें रोष की मात्रा आधी रह गई।अब उन्हें अहसास हुआ कि यदि बारह घण्टे में इतना फर्क हो गया तो क्यों न बारह घण्टे और रुका जाए,पत्रोत्तर देने में इतनी भी जल्दबाजी क्यों करना।बारह घण्टे बाद पत्र पढा और उन्हें लगा कि पत्र में अभी भी क्रोध की रेखाएं स्पष्ट झलक रही हैं।उन्होंने तीसरा पत्र लिखा ।पत्रों की भाषा लगातार संशोधित हो रही थी।अब तो उन्हें मजा आने लगा और फिर उन्होंने सोचा कि अब मैं सात दिन रोज संशोधित पत्र लिखूंगा और सातवे दिन ही पत्र पोस्ट करूँगा।
फिर उन्होंने सातवे दिन जो पत्र लिखा वह प्रेम और विनम्रता से परिपूर्ण था।क्षमा याचना के भाव से सराबोर होकर उन्होंने लिखा कि महोदया आपने मेरी त्रुटियों को लेकर मुझे आगाह किया है ,मैं हृदय से अनुग्रहीत हूँ।कृपया भविष्य में भी कृपा दृष्टि बनाए रखिएगा।वह महिला पत्र पढ़कर स्वयं उनसे मिलने आई और वे अच्छे मित्र बन गए।
अब देखिए न एक पक्ष के थोड़ा सा थमने,थोड़ा सा ठहर जाने से,सजगतापूर्ण प्रतिक्रिया देने से सम्पूर्ण परिदृश्य बदल गया।वरना दोनों बुद्धिजीवी अपने अपने अहम की संतुष्टि की खातिर अड़े रहते और निरंतर आरोप- प्रत्यारोप की झड़ी लगती जाती और मित्रता का एक खूबसूरत रिश्ता कभी भी अस्तित्व में नहीं आता बल्कि उक्त प्रसंग कड़वाहट के साथ समाप्त होता।दोनों ही पक्षों की मानसिक ऊर्जा सुख-शांति और बहुमूल्य समय की बर्बादी होती सो अलग। कुछ इसी आशय की बात करते हुए एक सुप्रसिद्ध विचारक कहते हैं कि- हममें से अधिकांश लोग स्वभावतः और जाने अनजाने में ऐसी प्रतिक्रिया करने वालों में शामिल रहते हैं जिसमें भड़कने का बटन दूसरे के हाथ में होता है।अगर मैं आपको अपमानित करता हूँ तो आप अपना आपा खो बैठते हैं या तकलीफ का अनुभव करते हैं।पर आप चयन करने में स्वतंत्र हैं कि अपमान को स्वीकार न करें।हमारी प्रतिक्रियाएं लोगों और परिस्थितियों द्वारा भड़काई गई होती हैं।किसी भी प्रतिक्रिया को चुनने में जल्दबाजी मत कीजिये बल्कि उसके परिणाम पर विचार करने के बाद ही सोची समझी प्रतिक्रिया दीजिए।
हमारे साथ भी कितनी बार ऐसा होता है कि बिना सोचे समझे त्वरित प्रतिक्रियाएं देकर हम फिजूल बातों पर अपना आपा खो देते हैं।बल्कि कई बार आक्रोशित लोगों को देख कर यूँ लगता है कि वे भरे बैठे रहते हैं मौका मिलते ही हर किसी पर अपना फ्रस्टेशन उँडेल देते हैं। घर ,आस-पड़ोस,बाजार ,ऑफिस ,बस ट्रेन में या राह चलते हम खूब उलझते हैं और बहसबाजी में पड़करअपना समय,ऊर्जा और सुख चैन जाया कर बैठते हैं।सोशल मीडिया पर भी लोग बिना सोचे समझे भड़क जाते हैं। जरा सा वैचारिक मतभेद हुआ कि लोग तपाक से अनाप शनाप प्रतिक्रियाएं देने लगते हैं।अमूमन जब ऐसे घटनाक्रमों पर ठंडे और शांत दिमाग से चिंतन किया जाता है तो अधिकांश मामलों में ग्लानि ही होती है। हमें असहमत होने का अधिकार भी है और अपनी बात रखने का भी ।पर असहमति भी विनम्रतापूर्ण और गरिमामय होनी जरूरी है।
इस संदर्भ में अनुभवी,विद्वान माइंडफुल पॉज़ की सलाह देते हैं यानि किसी भी स्थिति में तपाक से प्रतिक्रिया देने से बचें,कुछ पल ठहरें ताकि दिमाग को शांत होने का मौका मिले और कुछ बिंदुओं पर विचार करें-
क्या हर बात पर प्रतिक्रिया देना जरूरी है? या कुछ बातें नजरअंदाज भी की जा सकती हैं।
क्या तकरार,मतभेद या बहस को टालकर सूझबूझ भरे सहमति के बिंदु खोजे जा सकते हैं?
कहीं वस्तुस्थिति आपकी सोच से सर्वथा अलग तो नही है?
थोड़े से विराम थोड़ी सी सजगता और थोड़ी सी समझदारी से हम कई अप्रिय प्रसंगों से बच सकते हैं।
चलते चलते महाकवि कबीरदास जी के इसी विषय से सम्बंधित एक दोहे का साभार उल्लेख प्रासंगिक होगा-
आवत गारी एक है,उलटत होय अनेक।
आवत से नही उलटिए,वही एक की एक।





बहुत ही सुंदर और सटीक ढंग से आपने इसकी व्याख्या की है। आपको बहुत-बहुत बधाईयां।
शुक्रिया दिल से
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