डर की आँखों में आँखे डाल

आज मेरे ब्लॉग का शीर्षक पढ़कर एकबारगी आपको लगेगा कि बात किसी डरावने या हैरतअंगेज मंजर का निडरता से सामना करने के सिलसिले में है पर मामला कुछ ज्यादा ही दिलचस्प और चकित करने वाला है। आज हम बात कर रहे हैं खुद अपने ही दिमाग के सामने साहस के साथ डटकर खड़े होने की।और यह सिर्फ हम नही कह रहे बल्कि कई विशेषज्ञ इस संदर्भ में हुए अध्ययन और शोध के आधार पर कहते आए हैं और शायद इसीलिए यह कथन अस्तित्व में आया है कि - "rule your mind or it will rule you." यानि अपने दिमाग पर शासन कीजिए वरना यह आप पर शासन कर,आपको नियंत्रित करने लगेगा।​

एकबारगी इसे पढ़कर चौक गए न आप ? और आपको लगेगा हमारी बिल्ली हमसे ही म्याऊँ? यानि हमारा दिमाग हमसे गुस्ताखी? भला ऐसा कैसे।पर जब शांत मन और तार्किक नजरिए से अपने ही अनुभवों पर गौर फरमाएंगे तो पाएंगे कि कितनी बार और कितने दिनों तक आप महत्वपूर्ण कामों को टालते रहते हैं।रोजमर्रा के छोटे छोटे लक्ष्य हासिल करने का भी साहस नहीं जुटा पाते और ।इस टालमटोल को न्यायसंगत ठहराने के लिए आपके दिमाग के पास पर्याप्त कारण भी होते हैं। निश्चित रूप से मेरी तरह आप भी अक्सर महसूस करते होंगे कि जब भी कोई चुनौतीपूर्ण, रचनात्मक या कठिन टास्क हमारे सामने आता है तो हमारा खुद का दिमाग हमें रोकने की तैयारी शुरू कर देता है।जिस कार्य में दिमागी वर्जिश की अधिकता हो, हमारा दिमाग उसे फिलहाल टाल देने की कोशिश करने लगता है और उसे न करने के सौ कारण भी गिनाने लगता है।साहस और चुनौतीपूर्ण लक्ष्य के सामने आते ही दिमाग भयभीत रहने के फायदे बताना शुरू कर देता है और अक्सर हमें डराने में सफल भी हो जाता है।जितना ज्यादा बोझिल और उबाऊ काम होगा दिमागी कारगुजारियाँ उतनी ही ज्यादा बढ़ जाती हैं।जी हाँ हमारा अपना ही दिमाग राह का रोड़ा बन जाता है और हमें अपेक्षाकृत आसान राह की तरफ मोड़ देता है।क्योंकि उसे सुकून चाहिए वह आपको वहाँ ले जाएगा जहां आराम हो। या तो वह आपको सोशलमीडिया की आरामगाह की ओर मोड़ देगा या फोन पर लंबी चटपटी गपशप करने की ओर या फिर ऐसे कामों की तरफ आपका रुख कर देगा जो बिल्कुल सरल सहज हों और जिनमें दिमागी परिश्रम न के बराबर होता हो।जितने जटिल लक्ष्य होंगे ,दिमाग की गुस्ताखी उतनी ही तेज हो जाएगी।वह आपको बहलाएगा ,अभी तो वक्त है काम तो बाद में भी हो जाएगा और इस तरह आपके बहुत से जरूरी काम पेंडिंग मोड में चले जाते हैं और कई गैरजरूरी गतिविधियां बदस्तूर चलती रहती हैं।बानगियां कुछ यूं - घड़ी का अलार्म फुर्ती से बंद कर एक बार फिर लंबी तानकर सोना,सुबह की सैर,व्यायाम ,योग को लगातार टालना,विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों के दौरान भटकाव उत्पन्न होना ,ऑफिस ,कार्यक्षेत्र या घर के व्यवस्थापन या दूसरी कई महत्वपूर्ण योजनाओं को अमल में लाने में विवशता महसूस होना और भी ऐसे तमाम भटकाव की सूची है जो हम सबके मिलेजुले अनुभवों को मिलाकर बहुत लंबी हो सकती है।

अब सवाल यह उठता है कि दिमाग की इन गुस्ताखियों पर लगाम लगाने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है ?

इस संदर्भ में लेखिका मेल रॉबिन्स कहती हैं- "या तो आप रास्ता खोज निकलते हैं या बहाना।निर्णयशक्ति आपको साहसी बनाती है।" आगे वे कहती हैं 5 सेकेंड्स रूल अपनाइए जैसे ही आपको लगे आप किसी लक्ष्य की पूर्ति करना चाहते हैं अपने भीतर पांच,चार,तीन,दो,एक बोलिए और फुर्ती से लक्ष्य की दिशा में पहला कदम बढ़ा लीजिए वरना आपका ब्रेन शुरुवात के पहले ही आपको रोक देगा,वह हजार बहाने बनाएगा और काम स्थगित करने की पूरी कोशिश करेगा।अगर आपमें शुरुवात करने का साहस है तो बेशक आप लक्ष्यपूर्ति तक भी पहुँचेगे।

एक मशहूर गीतकार दिमाग की इन कारगुजारियों को अपने मजेदार अंदाज में समझकर कहते हैं कि "दिमाग से ज्यादा बदमाश उपकरण हमारे शरीर मे कोई दूसरा नहीं ।यह बना इसलिए था कि हम इसका इस्तेमाल करें पर होता यह है कि यह हमारा इस्तेमाल करने लगता है।एक बार इसे डाँटकर चुप करा दीजिए और फिर चमत्कार देखिए।"

एक अन्य अनुभवी विद्वान कहते हैं कि "दिमाग आपको डराएगा, यह मौका उससे छीनना होगा। कई दफ़ा काम में कूदना पड़ता है।"

तो आज की बात का जमाजोड़ यह कि शुभस्य शीघ्रम की तर्ज पर हर जरूरी काम की एक अच्छी शुरुआत कर दीजिए फिर देखिए कड़ियाँ जुड़ती जाएंगी और आप उक्त लक्ष्य के शानदार समापन तक पहुँच जाएंगे।

सजगतापूर्वक अपने दिमाग को आत्म सुझाव देकर प्रशिक्षित करते रहें। ताकि भटकाव का विचार आते ही आप अलर्ट मोड में आ जाएं।वरना सावधानी हटेगी तो दुर्घटना होना तय है हर सुबह टू डू लिस्ट जरूर बनाइए ।लिखित योजनाएँ दिमाग पर सकारात्मक असर डालती हैं और कार्यों की प्राथमिकता तय करती हैं।

हर सुबह टू डू लिस्ट जरूर बनाइए ।लिखित योजनाएँ दिमाग पर सकारात्मक असर डालती हैं और कार्यों की प्राथमिकता तय करती हैं।

चलते चलते यही कहेंगे कि दिमाग के झोल को जब हमने समझ ही लिया है तो जब भी किसी अच्छे काम को अंजाम देते वक्त दिमाग डर,दुविधा या भटकाव पैदा करे तो तुरंत संभल जाइए डर की आंखों में आंखे डालकर कहिए - सुनो शरारती दिमाग हमारे पास एक सहज बोध भी है,हम तुम्हारी भूलभुलैया से निकलने की राह जानते हैं।

आज बस इतना ही बाकी अगली बार

- Sindhu Kanhowa.

By Sindhu Kanhowa

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चित्रांश
चित्रांश
1 month ago

अत्यंत उपयोगी संदेश । वर्तमान युग के मानवों के लिए विशेषरूप से प्रेरणा प्रदान करने वाला यह लेख है इसके लिए आपको हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🏻🌺

Sunanda Pathak
Sunanda Pathak
1 month ago

इस तरह तो हमने कभी सोचा ही नहीं,एक विज्ञापन की लाइन याद आ गई।
एकदम अनछुए पहलु पर लिखा, सभी को पढ़ने योग्य

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