जीवन कहता है - मैं कर सकता हूँ
Swarnimasha मंच पर मेरे एक नए ब्लॉग में एक बार फिर आप सबका स्वागत है।आज मैं अपनी बात कहने के लिए एक अमेरिकी लेखक और प्रेरक वक्ता रिच डिवॉस का एक प्रेरक अनुभव लेकर आई हूँ।जिसे उन्होंने अपने किसी वक्तव्य में सांझा किया था।उक्त प्रसंग कुछ यूँ है कि एक बार सर रिच डिवॉस किसी कॉलेज के एक जलसे में बतौर अतिथि आमंत्रित थे।उस कॉलेज में पढ़ने वाली एक छात्रा उनके पास आई और बोली -सर आप वह सबसे मूल्यवान संदेश दीजिए जो मेरे जैसी नवयुवती को पता होना चाहिए। प्रेरक वक्ता ने उक्त छात्रा से कहा - यू कैन डू इट.आप इस फिलासफी का यथासम्भव पालन कीजिए क्योंकि आप जो चाहती हैं ,बेशक आप वह कर सकती हैं। डिवॉस कहते हैं -यह बात सुनकर उसे बहुत हैरानी हुई।उसकी आँखों की चमक और चेहरे की खुशी साफ बता रही थी कि यह चार जादुई शब्द उसे अचंभित कर उसके अंदर नई उम्मीदें जगा रहे थे।मैं भी बहुत खुश था क्योंकि मुझे उस छात्रा पर सकारात्मक असर डालने का अवसर मिला।
एक शोध के अनुसार माता- पिता,शिक्षक और समाज किसी बच्चे के जन्म से चौदह वर्ष की अवस्था तक उसे औसतन एक लाख अड़तालीस हजार बार उस पर यह प्रहार कर चुके होते हैं कि " तुमसे नही होगा" और इन तीन मारक शब्दों का सिलसिला जिंदगी के विविध क्षेत्रों में लगातार चलता रहता है।
जरा अपने अपने अनुभवों पर गौर कीजिएगा, जिंदगी की रेस में" तुमसे नहीं होगा " का बैरीकेड अनगिनत बार हमारे सामने आता है।कभी असीमित लाड़ और अतिरिक्त सुरक्षा की चाशनी में उन्नति के पंख चिपक जाते हैं तो कहीं स्वार्थ,चिढ़ या जलन की वजह से "तुमसे नही होगा" की मारक मिसाइलों से आपका आत्मविश्वास तार तार हो जाता है। कई बारआपकी खूबियों से भयभीत कतिपय तत्व भी असुरक्षा भाव के चलते कभी पुचकारकर या धमकाकर तो कभी हँसी उड़ाने के पुट में "तुमसे नहीं होगा" वाक्य का प्रहार करते रहते हैं ।वजह कोई भी हो धीरे धीरे आपका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है,हीन भावना आ जाती है और आत्म विकास से सम्बंधित छोटे छोटे निर्णय लेने में भी दुविधा उत्पन्न होने लगती है।धीरे धीरे हमारा दिमागी पैटर्न बदलने लगता है, जाने अनजाने में हम खुद अपने मस्तिष्क को भयभीत बने रहने और चुनौतियों से दूर भागने के निर्देश देने लगते है दुनिया की राय पर हमारी राय की भी मोहर लग जाती है और हमें अहसास भी नही होता कि you can not do it. कब I can not do it. में बदल जाता है।
पर आशाजनक बात यह है कि यदि आप ठान लेते हैं तो उम्र के किसी भी पड़ाव पर ये दिमागी पैटर्न बदले जा सकते हैं। असंभव कुछ भी नहीं बस बात बनती है संकल्पित मन यानि मजबूत इच्छा शक्ति से।
एक विचारक इसी बात को बड़ी ही खूबसूरती से कहते हैं कि" खुद पर भरोसा होना उस परम प्रज्ञा पर भरोसा जताने का तरीका है जिसने हमे बनाया है।जीवन कहता मैं कर सकता हूँ।एक छोटी चीटी,नन्ही सी दूब और अति सूक्ष्म जीव भी तमाम विषमताओं के बाद अपनी बढ़त इस विश्वास के साथ जारी रखते हैं कि - मैं कर सकता हूँ।"वे कहते हैं हमें जीवन की भाषा अपनानी होगी।
जीवन की भाषा अपनाने के लिए सोच बदलिए।हर नई सुबह नई उम्मीद के साथ जागिए।अनुशासन के साथ आत्म विकास से सम्बंधित छोटे छोटे बदलाव कीजिए। जो नई आदत विकसित करना चाहते हैं मनोबल के साथ उसकी छोटी शुरुआत कीजिए।सीढ़ी दर सीढ़ी प्रयास कर नए कौशल सीखिए।मस्तिष्क को लगातार आत्म सुझाव दीजिए ।छोटी छोटी जीत से आपका आत्मविश्वास बढ़ता जाएगा।आप दंग रह जाएंगे क्योंकि धीरे धीरे आपके दिमाग की वायरिंग बदलने लगेगी। बेशक निरन्तरता और धैर्य से चमत्कारी परिणाम हासिल होने लगेंगे।
चलते चलते-
परों में सिमटा, तो ठोकर में था जमाने की।
उड़ा,तो एक जमाना मेरी उड़ान में है।





वाह। आज के युग को ऐसे ही प्रेरणादायी एवं उत्साहवर्धन करने वाले विचारों की आवश्यकता है