तेरा जवाब यही है कि मुस्कुराए जा
आज मैं अपनी बात कहने के लिए महान चीनी ज़ेन गुरु लिन- ची के जीवन का सुंदर प्रसंग लेकर आई हूँ। लिन-ची के प्रवचनों में इस प्रसंग का उल्लेख कुछ यूं था-
" जब मैं युवा था तो मुझे नौका विहार का बहुत शौक था।मेरे पास एक छोटी सी नाव थी और उसे लेकर मैं अकेला ही झील की सैर करता था। मैं घण्टों झील में नौका विहार करता रहता था।
एक दिन बहुत सुहावने मौसम को देखकर मैं परम आनंद के भाव के साथ अपनी नाव लेकर झील में उतरा।मौसम और मन के सुंदर तालमेल के प्रभाव स्वरूप मैं आँखे बंद कर खूबसूरत कल्पनाओं में खोया हुआ अपनी नाव चला रहा था तभी एक खाली नाव विपरीत दिशा से आई और मेरी नाव से बुरी तरह टकरा गई।चूंकि मेरी आँखें बंद थी इसलिए मैंने सोचा किसी व्यक्ति ने जानबूझकर अपनी नाव मेरी नाव से टकरा दी।एक झटके में मेरी आनंद की अवस्था क्रोध में बदल गई।मैंने अपनी आंखे खोली और क्रोध से आग बबूला होकर उस व्यक्ति को खरी खोटी सुनाने ही जा रहा था कि मैंने देखा कि दूसरी नाव तो खाली है ।अब मेरे पास कोई उपाय ही न रहा कि अपना क्रोध कहाँ प्रकट करूँ।नाव तो खाली थी,वह खाली नाव धारा के साथ बहते हुए आई और अनियंत्रित होकर मेरी नाव से टकरा गई ।अब मेरे पास करने को कुछ नही था।एक खाली नाव पर क्रोध प्रकट करने का कोई औचित्य नही था।तब बस एक ही उपाय मेरे पास था।मैंने अपनी आंखें पुनः बंद कर ली और अपने अंतस में उठ रहे तीव्र क्रोध के ज्वार को अपनी मुस्कान से शांत किया,तुरंत अपनी दिशा बदली और पुनः उसी परमानन्द के साथ अपने गंतव्य की ओर बढ़ गया।
उस दिन वह खाली नाव मेरे आत्मज्ञान का कारण बन गई।वह खाली नाव मेरी गुरु बन गई।और फिर लिन-ची ने कहा - जब कोई व्यक्ति बिना वजह मुझे ठेस पहुँचाता है ,मुझे अपमानित करता है,नीचा दिखाने की कोशिश करता है तो मैं हँसता हूं और कहता हूं यह भी खाली है उस नाव की तरह।भला इससे क्या उलझना ? मैं आँखे बंद करता हूँ और अपने भीतर सरक जाता हूँ। वे कहते हैं इस विधि का प्रयोग करो,यह चमत्कारी साबित हो सकती है।
जब हम उक्त प्रसंग को गहराई से पढ़ते और मनन करते है तो पाते हैं कि कितना बेजोड़ सूत्र है यह । कल्पना कीजिए कि नाव में कोई व्यक्ति मौजूद होता और जो जाने अनजाने में साधक लिन-ची को ठोकर मारता निःसन्देह वे उससे उलझते फिर तनावग्रस्त अवस्था में आगे बढ़ते।बेशक वे अपनी मंजिल तक तब भी पहुँच जाते पर वह परमानन्द तो कहीं खो जाता जो यात्रा के शुरुआती दौर में उनके पास था और शेष यात्रा अशांत चित्त के साथ सम्पन्न होती।जबकि नाव टकराने का घटनाक्रम तो घट ही चुका था । लाख आग बबूला होने के बाद भी वह बदल नही सकता था,बल्कि वाद विवाद बढ़ने की सम्भावना ही ज्यादा बन सकती थी।
नाव खाली है एक फलसफा ही तो है उनसे निबटने के लिए जो जानबूझकर आहत करते हैं ,मौका मिलते ही नीचा दिखाते हैं या अक्सर ही ठेस पहुँचाते हैं । व्यक्तित्व में ये तमाम उपद्रव अंदरूनी ख़ालीपन से ही प्रकट होते हैं। क्रोध कुंठा ,नफरत और दुर्भावना से भरे लोग अंदर से खोखले ही होते हैं और यह खालीपन अक्सर ही बखेड़े खड़े करता है।इफरात खाली वक्त भी मुसीबतें खड़ी करता है और खाली दिमाग भी।
कितनी बार हमारे साथ भी तो ऐसा होता है ।हम बहुत अच्छे मूड में उमंगित मन से अपनी किसी योजना,कार्यक्रम या सफर का आगाज करते हैं और इस दौरान आदतन आलोचकों या जानबूझकर उलझने वालों से सामना हो जाता है।हमारा मन सहसा ही रंग में भंग डालने वाली इन परिस्थितियों को स्वीकार नहीं कर पाता और या तो हम अपना आपा खो बैठते हैं या बेहद दुखी और निराश हो जाते हैं। पर इन विपरीत परिस्थितियों में यदि सद्गुरु लिन-ची के मंत्र का अनुसरण किया जाए तो हम शांत और संयमित रहकर सूझबूझ के साथ इन बाधाओं को नजरअंदाज कर अपना चयनित मकसद पूर्ववत आनंद के साथ पूरा कर सकते हैं।
क्योंकि आपा खो बैठेंगे,
क्योंकि आपा खो बैठेंगे, और बहसबाजी में पड़ जायेंगे तो खुद अपना ही नुकसान कर बैठेंगे। मन के अशांत होने से दिमाग की वह खूबसूरत लय कहीं खो जाएगी जिसे लेकर हम अपना तयशुदा मन्तव्य पूरा करने के लिए अच्छे मूड के साथ निकले थे बल्कि आलोचकों या आदतन उलझने वालों का मकसद जरूर पूरा हो जाएगा। और जब जब हम " नाव तो खाली है " वाले फलसफे का आत्म नियंत्रण के साथ हँसते मुस्कुराते हुए पालन करेंगे तब तब अपनी शख्सियत की वजनदारी औरअमीरी पर गर्व महसूस होगा और तयशुदा उद्देश्य भी उमंग और ऊर्जा के साथ पूरे होंगे। आज बस इतना ही
चलते चलते---
नहीं इताब ए जमाना* खिताब के काबिल
तेरा जवाब यही है कि मुस्कुराए जा
इताब ए जमाना*-
दुनिया की नाराजगी





वाह वाह बहुत सुंदर
यूँ ही ब्लॉग पढ़ते रहिएगा
अत्यंत प्रेरणादायक एवं ज्ञानवर्धक अनुभूतिगम्य लेख।
हार्दिक आभार