ओ री चिरैया ** नन्ही सी चिड़िया

प्रिय गौरिया

यूँ तो हम न जाने कितने दिनों से तुम्हारी बाट जोह रहे हैं पर हर साल 20 मार्च को तो हम बड़ी अधीरता से तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं।आज के खास दिन अलसुबह से दिन ढलने तक हम कभी छत पर, कभी छज्जे पर ,कभी सामने वाले गुलमोहर पर तो कभी आसमान में टकटकी लगाए रहते हैं तुम्हारे इंतजार में आंखे थक जाती हैं पर तुम इस कदर रूठ गई हो नन्ही परी कि तुम्हारी एक झलक भी नहीं दिखती है। क्या तुम्हें पता है चूं चूं रानी कि हम सबने आज का खास दिन तुम्हारे नाम कर दिया है पर तुम्हारे यूँ ओझल होने से लगता है कि हमारी इत्ती सी गौरिया रानी भी इन तयशुदा दिनों के झमेलों को खूब समझती है।जरूर तुम समझ गई हो कि किसी चीज के खो जाने के बाद ही उसकी कीमत का अहसास होता है ,तुमबखूबी जानती हो कि ये विशेष दिवस महानता का ताज नहीं होते बल्कि कहीं न कहीं ये गहरे अपराधबोध और प्रायश्चित की पीड़ा से जन्मते हैं।

आज बूढ़े बाबा को दिन भर यह देखकर बहुत तकलीफ हुई कि जिस चिरैया के भरे पूरे कुनबे की से कभी उनका सारा घर खिलखिलाता था ,जिसकी चहचहाहट कभी उनके ओटले,खेत खलिहान की पहचान थी अब उसकी पहचान इतने संकट में है आज उनके ही पोते पोतियां उस लाड़ली चिरैया को गूगल पर खोज रहे हैं ।

समय की पाबंद अपनी इस लाड़ो की चहचहाहट से सुनहरी भोर और सुरमई साँझ का बिना घड़ी देखे बरसों तक समय का लगभग सही अनुमान लगाने वाले बाबा अभी भी नही भूले हैं कि उनकी ये लाड़ली चिरैया साँझ ढलते हीअपने पूरे कुल कुटुंब के साथ घर के बाहर लगे आम,नीम,अमरूद के पेड़ों पर किसी आज्ञाकारी संतान की तरह वापिस लौट आती थी।

चिड़िया रानी बुजुर्ग बाबा तुम्हारे झुंड के स्वाभाविक क्रिया कलापों जैसे धूल में नहाने और असामान्य रूप से चहचहाने से भी मौसम का सटीक अनुमान लगा लेते थे पर जब वे तुमसे जुड़े ऐसे रोचक प्रसंग बाल गोपालों के साथ सांझा करते हैं तब आज की तकनीक आश्रित नईपीढ़ी उनका मान रखने इन प्रसंगों को अचरज के साथसुन तो लेती है पर सच तो यह है कि वह इन प्रसंगों को कपोल कल्पना ही समझती है।घर के आँगन में हर सुबह अनाज के दाने बिखेरना और पानी से भरे सकोरे रखना आज भी एक संस्कार की तरह दादी नानी की दिनचर्या का अहम हिस्सा है।शाम ढलते ही निराशा के साथ इन्हें वापिस उठाने में उन्हें कितनी तकलीफ होती होगी काश यह संदेश तुम तक पहुँच जाए , उनकी यह उम्मीद कायम है इसलिए उनका यह सिलसिला भी कायम है।

चूं चूं रानी हम खूब जानते हैं कि तुम्हारा मन न तो जंगलों में रमता है न ही सुनसान खंडहरों में तुम्हे तो नन्हे शिशुओं की तरह हम सबके बीच घर आँगन में ही चहचहाना पसंद है ।सचमुच हम सबको गहरा अपराधबोध हो रहा है कि हम इंसानों की गलतियों की वजह से कितने भारी मन और घनीभूत पीड़ा के साथ तुमने हमारे रिहायशी इलाके छोड़े होंगे।तुम्हारे रूठकर जाने के पीछे हमारी प्रकृति विरुद्ध जीवनशैली,असीमित महत्वाकांक्षाएं ,आला दर्जे का भौतिकवाद और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ जिम्मेदार है।

जब तब मन में एक फाँस सी चुभती है तुमने कभी भी हमें किसी तरह का नुकसान नहीं पहुँचाया।हमारी रसोई से निकले व्यर्थ अंश से ही तुम्हारी नन्ही सी काया पल जाती थी।ओ नन्ही परी तुमने फुदक फुदक कर हमें न जाने कितने सबक सिखाए, अपने बालिश्त भर के पंखों पर गजब का भरोसा,अनुशासित दिनचर्या,अलमस्त फक्कड़ मिजाज जीवन में भी अकूत खुशी खोजकर चहकते रहना तुमने ही तो सिखाया।अंडे सेने से लेकर बच्चों को खुशी खुशी फुर्र से उड़ जाने के काबिल बनाने तक तुम निःस्वार्थ ममता और त्याग का जीवंत उदाहरण बनती रहीं।

आज तो सारे बुजुर्ग वार बहुत उदास हैं जिस नन्ही चिरैया के सानिध्य के बगैर उन्होंने जीने की कल्पना भी नही की थी आज उसका दिवस मनाने की नौबत भला क्यों ?

ओ छुटकू रानी अब तमाम गिले शिकवे भूलकर घर वापिस चली आओ।तुम्हे कोई कुछ नही कहेगा क्योंकि हम सब तो खुद ही बहुत शर्मिंदा हैं ।सुनहरी सुबह से सुरमई साँझ तक व्याकुल मन तुम्हारी बाट जोह रहा है।सारे बच्चों ने अपनी टीचर जी के सुझाव पर तुम्हारे स्वागत में अपने छोटे छोटे हाथों से रंग बिरंगे बर्ड हाउस बनाकर घर की मुंडेर,बगीचे और पार्कों में लगाए हैं ताकि तुम बेफ़िक्री से बसर कर सको।

तो देर किस बात की चली आओ न गौरिया चहचहाते हुएअपने भरे पूरे कुनबे के साथ

तुम्हारी अपराधी समस्त मानव प्रजाति

- Sindhu.

By Sindhu Kanhowa

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रश्मि
रश्मि
5 months ago

बहुत विचारणीय विषय पर आपका मर्मस्पर्शी लेख ।जो भविष्य के अकेलेपन एवं सूनेपन की चेतावनी भी दे रहा है

Harsh Adwani
Harsh Adwani
4 months ago

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