नवाज़िश करम शुक्रिया मेहरबानी
आज मैं अपनी बात कहने के लिए ओशो साहित्य से पढ़ी हुई एक गहराई से परिपूर्ण सुंदर कहानी लेकर आई हूँ।
एक महिला और उसका छोटा बच्चा समुद्र में अठखेलियां कर रहे थे। पानी का बहाव बेहद तेज था।महिला ने अपने पुत्र की बाँह मजबूती से थाम रखी थी।वे प्रसन्नतापूर्वक जलक्रीड़ा कर रहे थे ,वातावरण में उनकी खिलखिलाहट गूँज रही थी।सहसा पानी की एक विशाल तरंग उनके सामने आई।माँ ने भयभीत होकर देखा ,ज्वार की वह शक्तिशाली तरंग पूरे वेग से उनके ठीक सामने आई और ऊपर और ऊपर उठते हुए उनके ऊपर छा गई।कुछ ही पलों में पानी वापिस लौट गया पर छोटा बच्चा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।बुरी तरह घबराई,भयभीत,शोकाकुल माँ का करुण स्वर गूंज उठा "मेल्विन ,मेल्विन तुम कहाँ हो" रोते बिलखते हुए माँ ने पानी में चारों तरफ बच्चे को खोजने का प्रयास किया ।जब महिला का यह शक पुख्ता हो गया कि बच्चा लहरों के साथ कहीं खो गया है तब पुत्र वियोग में व्याकुल माँ ने आकाश की ओर अपनी आँखें उठाई और कातर स्वर में प्रार्थना की" हे दयालु,अतिप्रिय परमपिता मुझ पर रहम कीजिए, मेरा बेटा लौटा दीजिए ,मैं जिंदगी भर आपकी आभारी रहूंगी और आज मैं एक वचन भी देती हूँ कि हमेशा नेकी,उदारता और ईमानदारी के रास्ते पर चलूँगी।
सहसा गर्जना के साथ पानी की एक और विशालकाय तरंग आई और महिला के सिर को छूती हुई वापिस चली गई।ज्योहीं पानी वापिस लौटा ,महिला बेशुमार खुशी और अचरज से आकंठ हो गई क्योंकि उसका छोटा बच्चा उसके बगल में खड़ा मुस्कुरा रहा था,उसने आश्चर्यमिश्रित प्रसन्न्ता के साथ बच्चे को अपनी बाहों में भरकर हृदय से लगा लिया और उसके घुंघराले बालों में उंगलियां फिराने लगी ,सहसा उसे कुछ याद आया ,उसने पुनः आकाश कीओर आँखे उठाईं और असंतुष्ट स्वर में बोली" ओ मेरे प्रिय ,दयालु परमेश्वर पर बच्चे का हैट वापिस नहीं मिला । बच्चा सकुशल वापिस मिल गया पर हैट खो गया ।पल भर में ही प्रसन्नता पर मायूसी भारी पड़ गई।अब वह खुश नही कि बेटा वापिस आ गया,बल्कि दुखी है क्योंकि हैट खो गया ।
उक्त कहानी को पढ़ते साथ ही एकबारगी उस महिला पात्र के शिकायती स्वभाव, नकारात्मक नजरिए और बेवकूफ़ी पर चिढ़ और नाराजगी का भाव पैदा होता है क्योंकि हम स्वभाव से जजमेंटल होते हूं और त्वरित प्रतिक्रियाएं देने में सिद्ध हस्त भी ।पर कहानी को पढ़कर,गुनकर,थोड़ा थमकर जब खुद को टटोलते हैं तो निश्चित रूप से यह स्वीकारोक्ति उभरती है कि हम सबके साथ भी तो यही होता है,हम सिर्फ वही देखते हैं जो उपलब्ध नहीं है,अक्सर अनुपलब्ध अति सामान्य चीजें भी उपलब्ध अनूठी चीजों पर भारी पड़ जाती हैं,वही कहानी वाली बात सामने आती है कि जीवन ने जो दिया उसके लिए आभार की जगह बिल्कुल नहीं सिर्फ हैट खो जाने की शिकायत है।जीवन ने हमें इफरात सुंदर,श्रेष्ठ ,अचरजपूर्ण सौगातें दी हैं ,हम कभी भी हृदय से उनके प्रति कृतज्ञ नहीं होते,बस जो खो गया है ,दूसरे के पास है या मिलने से छूट गया है उसके लिए बिसूरते रहते हैं ।अप्राप्य सदैव प्राप्य पर भारी पड़ जाता है।हमारे चारों ओर बिखरे सुख,छिटकती खुशियों ,बेशकीमती नियामतों,अच्छी सेहत,रिश्तों की अनमोल पूँजी के प्रति उदासीनता , लापरवाही और नकारात्मकता का भाव हावी रहता है ।
उक्त शिक्षाप्रद, गूढ़ कहानी का मर्म यही है कि बेलगाम इच्छाओं को कभी भी आभार पर भारी मत पड़ने दीजिए।गहन दुख और भारी नुकसान के बावजूद जिंदगी में कृतज्ञता की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है ।इसलिए लाख उतार चढ़ाव के बावजूद भी जिंदगी मुस्कुराते रहने का जज़्बा रखती है।
कहते हैं कि कृतज्ञता एक इबादत की तरह होती है जो हमें ईश्वर के नजदीक ले जाती है तो क्यों न कहानी में निहित मर्म को आदर देते हुए कृतज्ञता या शुक्रगुजारी को हम अपनी आदत में शामिल करने की कोशिश करें।रोजाना आँख खुलते ही कृतज्ञता ज्ञापित करें उस परम शक्ति के प्रति जिसने हमें इतना खूबसूरत जीवन दिया,कुदरत के प्रति जिसने हमें अकूत करिश्माई नियामतें दी।माता पिता,गुरुजनों ,परिजनों, सच्चे मित्रों, हितैषियों और जाने अनजाने मददगारों के प्रति जिन्होंने हमारे व्यक्तित्व की साज सँवार में अनमोल योगदान दिया।
हम उन तमाम विषम और मुश्किल परिस्थितियों का भी शुक्रिया अदा करना न भूलें जिन्होंने हमें तराशा,मजबूत बनाया और हमारे अंदर जिंदगी के झंझावातों से निपटने का जीवट पैदा किया।
हर रात सोने के पहले दिन भर में आने वाले सुंदर प्रसंगों,व्यक्तियों और अनुकूल परिस्थितियों के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित करें ,धीरे धीरे आभार की श्रेष्ठ भावना आदत में शामिल होकर नजरिए को खुशनुमा और अनूठा बनाने में मददगार साबित होगी।





बहुत ही उद्देश्य पूर्ण लेख
Bhut hi badhiya likha hai mausi aapne🫶