मेरी माँ, मेरी पहली पाठशाला
आज अंतरराष्ट्रीय मातृ दिवस पर मैं अपनी पहली पाठशाला यानि अपनी माँ के जीवन से जुड़े कुछ प्रेरक प्रसंग आप सबके साथ सांझा कर रही हूँ। मेरी मम्मी श्रीमती आशा तिवारी अत्यंत सहज सरल स्वभाव की उदारमना महिला थीं।वे एक उच्च शिक्षित महिला थीं जो एक ग्रामीण अंचल के शासकीय उच्चतर माध्यमिक स्कूल में प्राचार्य पद पर लंबे समय तक पदासीन रहीं।एक ही ग्राम के एक स्कूल से उनका सेवाकाल शुरू हुआ और उसी ग्राम के दूसरे स्कूल से वे सेवानिवृत्त हुईं।वे हमेशा ही अपने विद्यार्थियों के लिए एक विद्वान और दयालु शिक्षिका, अधीनस्थों के लिए एक संवेदनशील अधिकारी और संस्था के लिए एक अनुशासित, ईमानदार ,कर्मठ और समर्पित कर्मचारी की भूमिका में रहीं।अपनी संस्था यानि उक्त स्कूल के प्रति उनका एक आश्चर्यजनक जुड़ाव मैंने होश संभालने से लेकर उनकी सेवानिवृत्ति तक हमेशा महसूस किया जिसे रूहानी जुड़ाव भी कहा जा सकता है।कर्तव्यनिष्ठा के अलावा इस अनूठे जुड़ाव की एक वजह यह भी कि जिस कस्बे से वे सेवानिवृत्त हुईं उस ग्रामीण अंचल में गर्ल्स हाईस्कूल के शुभारंभ के साथ प्रथम नियुक्ति मेरी मम्मी की हुई और उनके ही कुशल नेतृत्व में महिला शिक्षा की नींव रखी गई ।उस वक्त दान में प्राप्त एक जर्जर भवन में ग्राम पंचायत द्वारा उक्त कन्या शाला की शुरुआत की।
अल्पतम सुविधाओं,कई विषम परिस्थितियों ,न्यूनतम कर्मचारियों और जर्जर हवेलीनुमा ,जहरीले कीड़े मकोड़े युक्त इमारत को उन्होंने अपने और सहकर्मियों के सम्मलित प्रयासों से एक शिक्षण संस्था में तब्दील किया।सन 1971-72 में ग्रामीण अंचल में कन्या शाला का खुलना और एक सहज सरल महिला व्याख्याता की पालकों के घर घर जाकर की गई मीठी मनुहार रंग लाई और उक्त अंचल के ज्यादातर अभिभावक जो अपनी बेटियो की पढ़ाई मिडिल स्कूल के बाद बंद करवा देते थे,वे उन्हेंआगामी शिक्षा हासिल करने की सहर्ष अनुमति देने लगे।उक्त दशक और स्थानीय परिवेश के अनुसार, तय गणवेश सफेद ब्लाउज़ और आसमानी साड़ी में हाईस्कूल में प्रवेश लेने लगीं।इस तरह किशोरियों की उम्मीदों को नए पंख लगे और वे अपने सुनहरे भविष्य की इबारत लिखने का सपना संजोए हंसती खिलखिलाती हुई बड़ी संख्या में स्कूल में कदमताल करने लगीं।इस तरह मेरी मम्मी उस ग्रामीण अंचल में स्त्री शिक्षा की अलख जगाने की दिशा में मजबूत कड़ी साबित हुईं।
मेरी मितभाषी मम्मी का रवैया कभी उपदेशात्मक नहीं रहा।उनके सीधे सादे व्यक्तित्व और सरल सहज जीवन शैली से जो कुछ मुख्य सूत्र जो उनकी जिंदगी से मैंने चुने उनमे से एक यह कि जो आप हैं ,उसे साबित करने में किसी प्रयास की जरूरत नही होती और जो आप नही हैं वह सिद्ध करने में लाख प्रयास भी बेमानी ही होंगे।इस संदर्भ में एक शेर हमेशा उनके लिए मेरे जेहन में होता था- कोई न जान सका,उसके कद का अंदाज़ वो आसमां है ,मगर सर झुकाए बैठा है। उनसे ही सीखा कि पद प्रतिष्ठा, संपन्नता और रुतबे में खुद से श्रेष्ठ वर्ग के प्रति तो अमूमन सबका रुख विनम्र और कई बार चापलूसी भरा होता है पर आपकी शख्सियत इस बात से परिभाषित होती है कि क्या आप अपने से कमतर वर्ग के प्रति भी उसी विनम्रता से पेश आते है ?
कर्म ही पूजा का सिद्धांत उनकी जीवनशैली का अभिन्न अंग रहा।अपनी नई नियुक्ति के समय से ही युवा व्याख्याता के साथ प्रभारी प्राचार्य से लेकर लिपिक तक की जिम्मेदारी संभाली।सीमित संसाधनों और सीमित स्टॉफ के साथ अपने जज्बे और कर्तव्यपरायणता से कन्या शाला को स्तरीय मुकाम तक पहुँचाया। उक्त ग्रामीण अंचल की कई छात्राओं की प्रतिभा को तराशकर उच्च शिक्षा हेतु प्रेरित कर आत्मनिर्भरता की राह देकर यह अहम सबक दिया कि संसार के हर एक बिंदु से उन्नति और अवसर की राहें समान रूप से निकलती हैं।
मेरी माँ संस्था प्रमुख के रूप में कार्यरत थीं और अंतरात्मा से अपने पेशे से जुड़ी थीं इसलिए उनकी सेवानिवृत्ति के महीनों पहले हम सब भाई बहनों के साथ पापा के मन में भी एक संदेह था कि इस अनूठे जुड़ाव और अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलकर उन्हें बहुत तकलीफ होगी पर एक अदभुत, सुखद और प्रेरणादायक अनुभूति तब हुई जब अगले ही दिन से वे उतनी ही सहजता ,खुशी और आत्मसंतुष्टि के साथ घर और पूजा पाठ में रम गईं।और इस तरह उन्होंने एक बार फिर बगैर किसी उपदेश और आत्मप्रशंसा के हम लोगों को एक सीख दी कि अपनी प्रिय चीजों,महत्त्वपूर्ण पद,अधिकारों और स्थान को पूरी गरिमा,सम्मान और प्रसन्नतापूर्वक छोड़ना भी एक कला है।
संसार की प्रत्येक माँ रत्नगर्भा माँ वसुंधरा की तरह असीम संपदा,वैभव और सौंदर्य से सुसज्जित है।इसलिए माँ को परिभाषित कर पाना या शब्दों में अभिव्यक्त करना सर्वथा असंभव है।आज मेरी लेखनी भी इस विवशता का अनुभव कर रही है। इसलिए थोड़े कहे को बहुत समझिए और अगले ब्लॉग की प्रतीक्षा कीजिए





आपके द्वारा मॉं पर लिखा गया लेख भी शिक्षित कर रहा है।
शुक्रिया
👏👏
शुक्रिया
नि:शब्द ।सिर्फ सम्मान योग्य रचना।
आभार 🙏
अत्यन्त सुंदर
शुक्रिया
Bahut sunder
स्नेहाशीष अदिति
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