कहीं देर न हो जाए ............
आज मैं अपनी बात रखने के लिएआपको ओशो की एक कहानी लेकर आई हूँ।जर्मनी में एक नामी विद्वान था।उसने दुनिया भर में घूम करढेरों शास्त्र इकट्ठे किए।उसके मित्र उसके निजी पुस्कालय को देखकर ,अचरज से कहते तुम इन्हें पढ़ोगे कब ? और हमेशा ही उसका झल्लाहट भरा जवाब होता अरे! पहले सब इकट्ठे तो कर लूँ, यदि पढ़ने बैठ गया तो संसार में व्याप्त विशाल ज्ञान के भंडार को एकत्रित कब करूँगा? वह नामी गिरामी पंडित जिंदगी भर हिंदुस्तान, तिब्बत,चीन आदि देशों की यात्राएं करता रहा ।कहीं दूर खबर मिलती कि अफ्रीका के फलां जंगल की फलां जाति के पास एक किताब है जो छपी नहीं है तो वह अनुलिपि तैयार कर उसे भी ले आता।आखिर वह दिन आ गया जब उसके खोजी संग्राहक देश विदेश में घूम घूम कर अत्यंत सन्तुष्ट मन से उसे यह खुशखबरी देने आए कि अब धर्म की कोई किताब नहीं बची जो उसके संग्रह में न हो ।तब वह जर्जर बूढ़ा विद्वान अपनी जिंदगी कीआखिरी सांसें गिन रहा था।उसकी उम्र नब्बे पार कर चुकी थी।वह आँखे खोलकर हताशापूर्वक बोला अब इतना और कर दो मुझे स्ट्रेचर पर उठाकर मेरी लाइब्रेरी का एक चक्कर लगवा दो ।कम से कम आखिरी बार जी भरकर अपने संग्रह को देख ही लूँ।
विश्व विख्यातअनमोल साहित्य का अकूत संग्रह उनके सामने था पर उस संग्रह के सामने एक विवश,जर्जर व्यक्तित्व भी था।उक्त वयोवृद्ध विद्वान के जीवन के उन अंतिम पलों में उपजी हृदय की वेदना ,वह विवशता निःसन्देह कल्पना से परे है। यदि इस छोटी सी कहानी के समानांतर हम सब अपने जीवन को भी साक्षीभाव से चलचित्र की तरह देखें तो पाएंगे कि अमूमन हम सब भी जहाँ हैं बस वहाँ आनन्दित नहीं। कितनी बार हम भी ऐसे ही भरम के साथ जीते हैं कि कुछ भी न छूटने पाए बस संग्रह करते चलो उपभोग करने के लिए तो अभी उमर पड़ी है।पर कई बार सहसा सब ध्वस्त हो जाता है ,सारी योजनाएं धरी रह जाती हैं । हम अक्सर ही वर्तमान के आनंद को नजरअंदाज करके भविष्य को सुखमय,सुंदर बनाने के लिए बेतहाशा भाग रहे हैं।सुख सुभीते के तमाम साधन इकट्ठे कर रहे हैं। कई बार हम अपने आने वाले कल को एक अनूठा अध्याय,अवर्चनीय सुख का पर्याय मानते हुए अपने आज यानि वर्तमान को उसके रंग रोगन ,साज सज्जा में इतना झोंक देते है कि खुशी के कई बेशकीमती,रोमांचकारी अवसर सामने से निकल जाते हैं ।
भविष्य में आनंद प्राप्ति के इस मोहपाश की जुगत में हमारा आज कितना कुछ रीतता चला जाता है।खुशी के बेशकीमती अवसर छूटते चले जाते हैं,अनेक चीजें,अनमोल पल करीब तो आते रहते हैं पर हम उनकी ओर आंख उठाकर भी नहीं देखते।बाद में इस रिक्तता का मलाल ही बाकी रह जाता है। इस दौड़ में कई बार यह भी अहसास होता है कि तमाम जद्दोजहद और मशक्कत के बाद जब कुछ हासिल हुआ तब तक प्राथमिकताएं ही बदल गईं और एक पहलू यह भी कि कई चीजें हासिल होने से पहले जितनी लुभाती हैं वे हासिल होते ही घर के या मन के किसी कोने में उपेक्षित पड़ी रहती हैं।गोया मिल जाए तो मिट्टी है,खो जाए तो सोना है - - - - और फिर एक नई दौड़ शुरू हो जाती है ।
तो क्यों न थोड़ा थमकर,थोड़ा ठहरकर हम अपनी जिंदगी का पुनर्गठन करें ।बेशक भविष्य की फिक्र करें ,कल को पूरी दक्षता से नियोजित करें पर इस तैयारी को सनक या मर्ज न बनाएं।हर सुबह थोड़ा सा थमकर,थोड़ा ठहरकर अपने आज पर गौर कीजिए ,उसे जी भरकर जीने की कोशिश कीजिए।तमाम आपाधापी के बीच सदैव याद रखें "जिंदगी आज में निहित है "





बहुत ही सार्थकता से परिपूर्ण बिषय
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सही है जिंदगी की आपा धापी में, भागा दौड़ी में लोग अद्गी जिंदगी भी नहीं जी पाते।
जीवन अनमोल है, इसे उत्साह के साथ भरपूर जियें।
वाह दीदी बहुत सुंदर लेख ,और ग़ज़ब की लेखनी।
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