एक प्रेरक कथा -शक्ति संभावना की

लगभग सभी धर्मग्रंथों में मनीषियों ने प्रकृति और आसपास के परिवेश से सहज सरल उदाहरण चुनकर विविध कथाओं ,उपकथाओं दृष्टांतों ,आपसी संवादों आदि के माध्यम से जीवन दर्शन और व्यक्तित्व विकास से जुड़े कई बेजोड़ सूत्र और संदेश दिए हैं। इसी तारतम्य में हम छान्दोग्य उपनिषद के एक सुंदर प्रसंग पर आते हैं -

उपनिषद में एक कथा है श्वेतकेतु की।उसके पिता उसे उपदेश दे रहे हैं,पास ही बरगद का एक वृक्ष है। उसके नीचे कुछ फल गिरे हैं ।पिता ने बेटे को एक फल देते हुए पूँछा 'यह क्या है'?

यह तो इसी बरगद का एक फल है ,श्वेतकेतु बोला । पिता ने कहा- इसे तोड़ो ।इसके भीतर क्या है ? 'इसके भीतर तो बहुत सारे इसके बीज हैं पिताजी' पिता ने एक बीज बेटे को देते हुए कहा 'इसे तोड़ो क्या है इसके भीतर?' श्वेतकेतु ने वह नन्हा सा बीज तोडा और ध्यान से देखकर कहा भला क्या है इसके भीतर ?इसमें तो कुछ भी नहीं , कुछ भी नहीं दिख रहा पिताजी इसके भीतर । पिता ने कहा 'बस जहाँ तुम 'कुछ नहीं' देख रहे हो वहीं इतना ही बड़ा एक बरगद का वृक्ष छिपा हुआ है। उपयुक्त परिस्थितियां पाकर यही' कुछ नहीं'(बीज ) एक विशाल वृक्ष के रूप में प्रकट हो जाता है।

पिता पुत्र के इस छोटे से खूबसूरत संवाद से जो अहम संदेश और श्रेष्ठ जीवन जीने के सूत्र निकलकर सामने आते हैं ,चलिए हम उन पर नजर डालते हैं - एक नन्हा सा बीज भी विकास की हद तक पहुँचने का हुनर रखता है। यूँ तो हर बीज का गुणधर्म है ,विशालकाय वृक्ष में परिवर्तित हो जाना, पर तमाम संभावनाओं के बावजूद भी इनमें से विरले ही विस्तार की हद तक पहुंच पाते हैं क्योकि कुदरत का नियम है - सरवाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट।जो विस्तार की तीव्र अभिलाषा से लबालब हो ,जिसके अंतस में अपने अस्तित्व के उच्चतम प्रकटीकरण की तरंगें उफान पर हों ,यहाँ गुनगुनी या लिजलिजी नहीं बल्कि खौलती हुई जिजीविषा, अदम्य इच्छाशक्ति और साहस की आवश्यकता होती है।

प्रत्येक ताकतवर और उमंगित बीज को उच्चतम स्तर तक पहुंचने का अधिकार तो है पर अब एक दूसरा नियम भी निकलकर आता है कि अंतिम लक्ष्य, शिखर या पूर्णता उसी सुपात्र को मिलती है जो निरंतर परिश्रम करते हुए अपना परिपूर्ण (सर्वोत्तम ) देता है ,इस सम्पूर्ण लम्बी प्रक्रिया में अनेक बीज किसी न किसी स्तर पर पहुँचकर धराशाई हो जाते हैं परन्तु जो बीज वृक्ष तक पहुँचने की प्रक्रिया के तमाम स्तरों से संबधित संघर्ष,विषम परिस्थिति और चुनौतियों को बखूबी साध लेते है,जो आंधी ,तूफ़ान ,घनघोर बारिश ,कड़कड़ाते जाड़े और प्रचंड गर्मी को सहन करते हुए भी नहीं डिगते और प्रतिस्पर्धा में बने रहते है ,वे निरंतर प्रगति की ओर गतिमान होते हैं ।अब कुदरत का एक और नियम निकलकर आ जाता ,यहाँ अधीरता का कोई स्थान नहीं है,हर चीज अपने तय समय में ही मुकाम तक पहुँचती है इसलिए जो धीरज के साथ हौसला खोए बिना इस कठिन प्रतिस्पर्धा में अंत तक डटे रहते हैं,सिर्फ वे ही अपने मकसद तक पहुँचकर लहराते हुए गगन चूमते हैं।

यह छोटी सी अर्थपूर्ण कथा संदेश देती है कि जब एक नन्हे से बीज में अपनी कुदरती क्षमता को परखकर उस पर काम करने की की अकुलाहट है , विस्तार की सुगबुगाहट है तो सर्वाधिक शक्ति सम्पन्न कौम से ताल्लुक रखने वाले हम इंसान भला क्यों पीछे रहें ? ईश्वर ने हमें जिस विशेष प्रयोजन निमित्त भेजा है,बीज रूप में जो काबिलियत हमारे अंदर समाई हैं , एकबारगी भले ही नजर नहीं आतीं , स्वखोज करते हुए उन्हें पहचानें ,परखें और उन पर काम करे। हमेशा अपना सर्वोत्तम देते हुए भरपूर शिद्द्त और धीरज के साथ आत्म विकास की दिशा में प्रयासरत रहें।

- Sindhu.

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22 days ago

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