अब उड़ना है आसान,छूना है आसमान ———
आज विश्व साइकिल दिवस है और आज के आलेख का शीर्षक,अस्सी -नब्बे के दशक की एक मशहूर साइकिल कंपनी के टेलीविज़न और अखबारों में छाए एक विज्ञापन के जिंगल से उठाया है।वह कालखंड साइकिल का स्वर्णिम कालखंड रहा है। उस दौर के कई मशहूर मॉडल और नामी गिरामी हस्तियाँ साइकिल कंपनियों के विज्ञापन के साथ टेलीविज़न के पर्दे और अख़बारों के मुखपृष्ठ पर प्रकट होती थीं। याद तो कीजिए उन सुनहरे दिनों को जब बड़े लोगों को फर्राटे से साइकिल चलाते देखकर आपका बालसुलभ मन अचरज और खुशी से भर जाता था। बड़े ही कमाल की चीज लगती थी साइकिल और उसे चलाते हुए लोग। आँखों में साईकिल से फर्राटा भरने और हवा से बतियाने का चमकता ख़्वाब समेटे हुए हम घर आंगन ,स्कूल या हाट बाजारों में खड़ी साइकिल के पुर्जे पुर्जे को ललक और कौतुहल के साथ घंटों छू छूकर देखते और फिर साइकिलिंग का हुनर हासिल होते ही हम, आज मैं आगे जमाना है पीछे ........... की तर्ज पर विश्व विजेता की तरह लहराते इतराते हुए शान बघारते फिरते थे।उन दिनों साइकिल के भी कई स्टंट युवाओं में लोकप्रिय हुआ करते थे। अमूमन हम सबके 'बसपन का प्यार' रही है,यह शान की सवारी और हमारे दिलो दिमाग में रची -बसी यादों की खूबसूरत बस्ती की एक आंकी बांकी पगडंडी साइकिल-प्रेम से रोशन है।
जिंदगी एक पाठशाला ही तो जनाब .......गर सीखने का जज्बा हो तो हमारे आसपास मौजूद और रोजमर्रा की जिंदगी से ताल्लुक रखने वाली हर चीज, जिंदगी के तमाम फलसफे,ढेरों सबक और इफरात सलीके सिखाने का हुनर रखती है। अपने बचपन का पन्ना तो पलटकर देखिये आज भले ही साईकिल आपकी यादों का हिस्सा हो पर कभी आपके ख्वाबों में अक्सर तशरीफ़ लाने वाली साइकिल ने जिंदगी के कितने कुछ पाठ पढ़ाए है आज विश्व साइकिल दिवस पर यादों की पिटारी को खँगालकर उन पर पर बात करते हैं-
पहला पाठ जो साइकिल ने बखूबी पढाया वह है गिरकर उठने का पाठ । जरा याद तो कीजिए जब पहले पहल आपने साइकिल चलाना सीखा था ,आप बारम्बार धड़ाम धड़ाम गिरते और धूल झाड़कर फिर खड़े हो जाते।छोटी बड़ी खरोचें भी आती रहती थीं पर फर्राटेदार साइकिल चलाने का जज्बा जस का तस रहता।छोटी मोटी खरोचों की अनदेखी और बड़ी पर मरहम पट्टी करके आप फिर मैदान में आ जाते और और फिर कई बार गिरते पड़ते हुए अंततः यह हुनर हासिल हो ही जाता था।बार बार गिर कर उठने और फिर एक दिन पारंगत हो जाने पर शिक्षा यह मिली कि सफल होने के पहले आपको कई बार असफलता का सामना करना पड़ेगा पर इनसे डरने की बजाय उत्साह और हौसले के साथ डटे रहेंगे तो एक दिन विजेता बन ही जाएंगे।
क्लॉड पेपर का एक प्रसिद्ध कथन है कि -जिंदगी साइकिल चलाने की तरह है ,आप तब तक नहीं गिरते जब तक पैडल मारना बंद नहीं करते। निःसंदेह साइकिल हमें सक्रिय जीवन जीने का सबक सिखाती है।हर रोज सजगता के पैडल मारते रहिए। सदैव गतिमान और जीवंत बने रहिए। निरंतर प्रयास, नियमित अभ्यास से कुशलता बढ़ती है जो पढ़ाई ,रोजगार हुनर,स्वास्थ्य और व्यक्तित्व जैसे जिंदगी के महत्वपूर्ण आयामों की गुणवत्ता में वृद्धि करती है।
जिंदगी के तमाम जरूरी आयामों के मध्य संतुलन साधने का शुरुवाती पाठ भी तो हमें बचपन में ही साइकिल ने सिखा दिया था।इसे सीखने की प्रक्रिया में लगातार दिमागी वर्जिश होती है,रोज रोज के अभ्यास से दिमाग और शरीर के बीच तालमेल बैठने लगता है,और फिर एक दिन आप साइकिल चलाने में कुशलता हासिल कर लेते हैं। संतुलन साधने की यह कला जिंदगी भर काम आती है।
जिंदगी की सरलता सहजता को इंगित करते मिनिमलिज़्म के सिद्धांत की एक गुरु अपनी हल्की फुल्की ,नन्ही,कमनीय सी साइकिल भी है। जहां कम में ही काम चल जाए वहां भला ज्यादा लवाजमें की क्या जरूरत ? जब कम दूरी तय करनी हो ,यदि आपका छोटे रास्तों से अक्सर ही वास्ता पड़ता हो बड़े और भारीभरकम वाहनों की बजाय तो उठा लीजिए अपनी नाजुक सी साइकिल और सर्र से निकल जाइए। फिटनेस भी आएगी ,पर्यावरण संरक्षण में योगदान होगा। अंत में , दुनिया के तमाम देशों की सैर के लिए साईकिल का प्रयोग करने वाले स्कॉट स्टोल के कथन का उल्लेख भी यहां बेहद प्रासंगिक और शिक्षाप्रद होगा ,उनका कहना है विश्व भर में साइकिल चलाने के सफर की शुरुवात पैडल पर पहले स्ट्रोक से होती है यानि आपका लक्ष्य कितना भी बड़ा हो ,पहला छोटा सा शुरुवाती कदम उसकी सम्पूर्ण सिद्धि में बहुत महत्वपूर्ण होता है।
आज विश्व साइकिल दिवस पर बस इतना ही।आप भी जरूर बताइयेगा आपको साइकिल ने क्या क्या सिखाया।





शिक्षा प्रदान कहानी
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